Sunday, 27 July 2025

जानवरों का आंतरिक जीवन - Sunbeam Gramin School

अध्याय – आराम

जानवरों के लिए आराम का मतलब है कि वे अपने प्राकृतिक व्यवहार को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें और अपने वातावरण में सहज महसूस करें। इसमें पर्याप्त भोजन और पानी, उपयुक्त तापमान, सुरक्षित आश्रय, बीमारियों या चोटों से मुक्ति, सामाजिक संपर्क, सुरक्षा की भावना और तनाव या डर से मुक्ति शामिल है।

एक ऐसा वातावरण, जहाँ वे स्वतंत्र रूप से घूम सकें, खेल सकें और अपनी प्राकृतिक आदतों को पूरा कर सकें, वास्तव में उनके लिए आरामदायक होता है।

धन्यवाद।
सीमा

जानवरों के आराम या सुख का अर्थ है उनकी ज़रूरतों को पूरा करना। इसके लिए उन्हें एक ऐसा प्राकृतिक वातावरण मिलना चाहिए, जिसमें भोजन, पानी और सुरक्षित स्थान उपलब्ध हों।
हमें पेड़ों की कटाई कम करनी चाहिए, चिड़ियाघर और अभयारण्य जैसे स्थान बनाकर उन्हें संरक्षण देना चाहिए। ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए जो उनके लिए हानिकारक हों या उन्हें कष्ट या चोट पहुँचाएँ।
इससे वे सुरक्षित और आराम से जीवन जी सकेंगे।

धन्यवाद।
सूरज पटेल

गुरुओं की कुर्बानी: एक भूलने योग्य नहीं कहानी - Sakshi Pal

इस एपिसोड से मुझे यह समझ में आया कि कभी भी किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। सभी को एक समान मानना चाहिए।अब ज़रा गुरु के सिंहों के बारे में ध्यान से सुनिए — दस लाख सैनिकों से टक्कर लेने वाले, जो सूरमाओं की गिनती में आते हैं। चालीस की संख्या में चमकौर के युद्ध में वीरता से लड़ते हुए बलिदान देने वाले  जोड़ी लड़ाके थे, जो अपने साथियों के साथ पाले गए थे।

छोटे साहिबजादे — बाबा ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह — अपनी दादी जी के साथ थे। रास्ते में उन्हें गंगू ब्राह्मण मिला, जो माताजी और बच्चों को अपने गांव खेड़ी ले आया। यह वही गंगू था जो पहले गुरुघर में सेवा करता था, रसोइया था और लंगर बनाता था। लेकिन वह भीतर से दगाबाज़ था। उसने रात को माताजी को दो मंजी (खाट) लाकर दी। माताजी ने कहा, "हमें एक मंजी की ही ज़रूरत है, क्योंकि मेरे पोते मुझसे कभी दूर नहीं सोते।"

रात होते-होते बच्चे अपनी दादी से कहने लगे, “अब माताजी, पिताजी और बड़े भाई हमें लेने आएंगे, तो हम उनके साथ नहीं जाएंगे।” बच्चे जानते थे कि वे बलिदान देने वाले परिवार से हैं, और उनका आत्मबल अपार था। उधर गंगू ब्राह्मण का असली चेहरा सामने आया — वह बेईमान हो गया। उसने रात को माताजी की सोने की थैली चुरा ली। वह यह भूल गया कि जिसकी थैली वह चुरा रहा है, वह वही बुज़ुर्ग माता है, जिसकी जवानी में उसके पति ने हमारे तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक पर अपना सिर दे दिया था।

गंगू यह भी भूल गया कि हमारे हिंदू धर्म को बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। इस घटना से यह सीख मिलती है कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति हो — चाहे हमारे गुरु हों या आमजन — हमें उनके उपकारों को कभी नहीं भूलना चाहिए। कभी भी किसी के साथ धोखा नहीं करना चाहिए, जैसा कि गंगू ब्राह्मण ने माता जी के साथ किया। गंगू ब्राह्मण को यह याद रखना चाहिए था कि जिन गुरुजी ने हमारा तिलक और जनेऊ बचाने के लिए अपना सिर दे दिया, उनके परिवार के साथ धोखा करना कितना बड़ा अधर्म है।

Sakshi Pal

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